अदभूत अलंकार के धनी जो निरंतर शांभवी में स्थित रहता है , वो रौद्र महाकाल का स्वरूप भगवान शंभू शंकर है। वो आदियोगी शिव है, जिससे योग की धारा बहती है। वही भगवान दक्षामूर्ति बन कर गुरु सत्ता को ज्ञान प्रदान कराते है। जो कालो का काल है वह महाकाल है। जिसका डमरू बीज मंत्रों की उत्पत्ति कर ध्वनि विज्ञान को जन्म देता है, तो जिसका तीसरा नेत्र तेज का रौद्र का परिचय कराता हैं। वही चंद्रेशेखर मस्तक पर चंद्र धारण करता है ,अपने तीसरे नेत्र से कामदेव को भस्म करता है वही महाकाल शिव शंभू है। कंठ में विष को धारण करता ,सर्प की माला को अपना आभूषण करता अति रौद्र सा प्रतीत होता है ,भारत की गुरु सत्ता उस कल्याणकारी शिव का आव्हान करती है, जो रौद्र है तो सदा शिव है। मंगलकारी शिव अपने हर एक कला से अनंत का बोध कराते है।वही भारत की पुण्य भूमि में ऋषि पतंजलि बनकर योग का दर्शन करते है। वहीं ऋषि विश्वामित्र बनकर गायत्री के 24 शक्तियों का ज्ञान कराते है। भगवान शिव की महिमा अनंत है। यह तक हमने भगवान शिव के वर्णन को देखा पर यहां हमे भगवान शिव के दूसरे अंग उपासना विद्या को जानने का प्रयास करेंगे। ...
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