मानव जीवन में समय का अलग ही महत्व है। समय किसी के भी वश में नहीं है। समय का चक्र निरंतर चलता रहता है। समय के साथ जीवन को जीना ही सफल माना जाता है। भारत के प्राचीन वैदिक काल की संस्कृती अपने चरम पर ज्ञान का प्रवाह करती प्रतित होती है। जिस संस्कृती ने समय को ही साधना अभिन्न अंग मानकर संध्या का दर्जा दिया हुआ है। समय का सद्पुयोग कैसे किया जाता है ? यह संस्कृति समस्त मानव जाति को परिचय देती है। सायंकाल की संध्या और प्रातःकाल की संध्या में क्या करें? क्या करना चाहिए, क्या विचार करना चाहिए? आपको इन दोनों समयों में आत्मबोध और तत्त्वबोध की साधना करनी चाहिए। प्रातः काल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया करें। यह अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ है-'पिछले जन्म की समाप्ति और उस दिन की मौत'। सवेरे उठने का अर्थ है 'नया जन्म'। 'जब आँख खुली तब नया जन्म' आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सवेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए? आपकी सारी बुद्धिमानी इस बात पर टिकीहुई है कि आपने अपनी जीवन-संप...
Thewishstatus.com is the best website for Wisdom, visit for best Motivation, Spirituality , Yoga, Ayurved, Vedic knowledge Science, Research, Medicine WhatsApp