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आध्यात्म से आत्मविस्तार

ज्ञान कर्म और उपासना, व्यक्ति इन तीनों से कभी भी खाली नहीं रहता। इन तीनों को शुद्ध बनाएं। तभी आपका इस जीवन का भविष्य तथा अगले जन्मों का भविष्य सुखदायक होगा। कर्मों का फल बहुत जटिल विषय है। बड़े-बड़े विद्वान इस विषय को ठीक से समझ नहीं पाते। ऋषियों ने वेदों का गहराई से अध्ययन किया, चिंतन मनन किया, और कर्मफल के विषय में कुछ बातें सबके सामने प्रस्तुत की। उनके अनुसार यह सार है, कि जो भी व्यक्ति, जो भी कर्म करता है, उसको उसका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। फल भोगने में कोई भी छुटकारा नहीं है। जैसे बिजली की तार छूने से करंट लगता है। इसमें एक बार भी माफी नहीं होती। ऐसे ही कर्म फल में, ईश्वर के कानून में, कहीं भी कोई भी माफी नहीं होती।थोड़े कर्म का थोड़ा फल। अधिक कर्म का अधिक फल। अच्छे कर्म का अच्छा फल। बुरे कर्म का बुरा फल, मिलता अवश्य है। अपने सही समय पर मिलता है। किस कर्म का फल कब कहां क्या और कैसे देना, इसका निर्धारण ईश्वर करता है। क्योंकि वही इस विषय को ठीक प्रकार से जानता है, और कर्मफल देने में समर्थ भी है।          जैसा कि ऊपर कहा है, उसके अनुसार ईश्वर की...

सूर्य रश्मि चिकित्सा एवं विज्ञान।

सूर्य का महत्त्व समझाने के लिए हमारे धर्म ग्रंथों में अनादि काल से वर्णन है। परंतु एक बात पक्की है कि यह हमें प्राचीन समय से अपनी ओर आकर्षित करता आया है। हम पिछले युगों में जाएँ या आज के युग की बात करें, सूर्य हमेशा जीवनदायिनी ऊर्जा देता आया है। सूर्य के बारे में जानने के लिए आज का वैज्ञानिक दिन-रात एक कर रहे हैं, जबकि हमारे ऋषि-मुनि इसकी दिव्यता और उसका उपयोग करना भी जानते थे। सूर्य मात्र हमारे शरीर को ही नहीं हमारे सूक्ष्म शरीर को भी अपनी चैतन्य शक्ति से जीवंतता प्रदान करता है। वैज्ञानिक इसे आग का गोला कहें अथवा कोई ग्रह परंतु प्राचीन काल में ही इसके अनेक रहस्यों को हमारे मनीषियों ने समझ लिया था और उसका उपयोग करने की कला को जन-कल्याण तक पहुँचाया था परंतु अब सूर्य का ज्ञान लुप्तप्राय है। यहाँ पर हम थोड़ी सी चर्चा सूर्य के रहस्य को समझाने के लिए करना चाहते हैं, ताकि हम जब सूर्य नमस्कार करें तो हमारे मन में श्रद्धा, लगन और आस्था प्रकट हो और हम उससे लाभान्वित हो सकें। बनारस में एक बहुत बड़े संत हुए हैं।   जिनका नाम था स्वामी विशुद्धानंद परमहंस और उनके शिष्य थे काशी हिंदू ...

आत्मसुधार संभव है।

अनंत की सत्ता निरंतर ही आपका साथ देती है। आपको जरूरत है इसे अनुभव करने की। यह अनंत परमात्मा की शक्ति आपको जरूरत पड़ने पर मार्ग दिखाने का काम करती है। परमात्मा के विस्तार की कल्पना करना कठिन है। किन्तु अणु के भीतर विद्यमान उस महती शक्ति का सरल साक्षात्कार हो सकता है। पानी के एक बूंद में सरोवर की समस्त विशेषताएं विद्यमान है। उसी प्रकार अग्नि की छोटी सी लौ में अग्नि की दाहकता मौजूद है। बीज में वृक्ष और शक्राणु में समूचा विश्व विराजता है। परब्रम्ह की सत्ता का विराट दर्शन अखंड पुरुषार्थी व्रतधारी को ही होता है। अच्छा हो हम दिशाओं को महकाने वाली कस्तूरी को अपनी ही नाभी में केंद्रीभूत देखे। अपने को समझे ,जगाएं, उभारे और इस योग्य बनाए की उस एक में ही पारस , कल्पवृक्ष और अमृत की उपस्थिति का अनुभव निरंतर होने लगे। मानवी पराक्रम ,विवेक, सार्थकता इसी क्षेत्र की प्रगति से परखी जाती है।  साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, कर्त्तव्य ने, उत्तरादायित्व ने, विवेक ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी नही की जा सकेगी। आत्मनिर्माण के लिए, नवनिर्माण के लिए हम कांटों से भरे रास्तों का स्वागत करेंग...