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आत्मसुधार संभव है।

अनंत की सत्ता निरंतर ही आपका साथ देती है। आपको जरूरत है इसे अनुभव करने की। यह अनंत परमात्मा की शक्ति आपको जरूरत पड़ने पर मार्ग दिखाने का काम करती है। परमात्मा के विस्तार की कल्पना करना कठिन है। किन्तु अणु के भीतर विद्यमान उस महती शक्ति का सरल साक्षात्कार हो सकता है। पानी के एक बूंद में सरोवर की समस्त विशेषताएं विद्यमान है। उसी प्रकार अग्नि की छोटी सी लौ में अग्नि की दाहकता मौजूद है। बीज में वृक्ष और शक्राणु में समूचा विश्व विराजता है। परब्रम्ह की सत्ता का विराट दर्शन अखंड पुरुषार्थी व्रतधारी को ही होता है। अच्छा हो हम दिशाओं को महकाने वाली कस्तूरी को अपनी ही नाभी में केंद्रीभूत देखे। अपने को समझे ,जगाएं, उभारे और इस योग्य बनाए की उस एक में ही पारस , कल्पवृक्ष और अमृत की उपस्थिति का अनुभव निरंतर होने लगे। मानवी पराक्रम ,विवेक, सार्थकता इसी क्षेत्र की प्रगति से परखी जाती है।  साहस ने हमें पुकारा है। समय ने, कर्त्तव्य ने, उत्तरादायित्व ने, विवेक ने हमें पुकारा है। यह पुकार अनसुनी नही की जा सकेगी। आत्मनिर्माण के लिए, नवनिर्माण के लिए हम कांटों से भरे रास्तों का स्वागत करेंग...