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यज्ञो वै श्रेष्ठतम कर्म


आज हम आधुनिकता के साथ कदम पर कदम रख रहे है। इसी के साथ क्या हम सचमुच सुरक्षित है।हर एक पल हम संघर्ष के साथ जी रहे है।देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ रहा प्रदूषण जीवन की बढ़ी समस्या के रूप में उभर कर सामने आया है।यह सांस के उपर का  संकट क्या सिर्फ लॉकडाउन ही इसका कोई इलाज है तो जिंदगी बचाने के लिए जरूरी नहीं है।
प्रदूषण को नियत्रण रखना पर्यावरण को स्वच्छ रखना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है और इसी के उपर सक्त कानून बनना चाहिए।
हर एक स्तर पर इको फ्रेंडली वातावरण को निर्मित करना चाहिए, जिससे की प्राथमिक स्तर पर काम हो। शिक्षा विभाग में पाठशाला में भी पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ कदम उठाए जाए।पाठशाला में भी विद्यार्थी को भी पर्यावरण संरक्षण के लिए पाठ पढ़ाया जाए, जिससे प्राथमिक स्तर के आव्हान को कम किया जाए।


पर्यावरण प्रदूषण की समस्या के कारणों के विषय में क्या आप जानते हैं?

1. सामान्य रूप से हवा में 21% ऑक्सीजन 78% नाईट्रोजन, 0.03% कार्बनडाय ऑक्साईड तथा लगभग 1% अन्य जहरीली गैसों के मिलने के कारण इसकी संरचना में परिवर्तन होने से वायु प्रदूषण होता है।

2.  60% वायु प्रदूषण मोटर वाहनों से और 35% बड़े तथा फैलता है। मध्यम उद्योगों से फैलता है। एक मोटर वाहन 970 कि. मी. की यात्रा में उतना ऑक्सीजन फूंक डालता है जितना एक व्यक्ति को एक वर्ष के लिए आवश्यक होता है।
किसी भी स्वचालित वाहन में एक गैलन पेट्रोल/डीजल के दहन से तीन पाउंड नाइट्रोजन ऑक्साइंड
वायु निकलती है जोकि 5 से 20 लाख घनफीट हवा को प्रदूषित कर देती है। 

3  प्राकृतिक सन्तुलन के लिए पृथ्वी पर भूमि के 33% भाग पर वन होना अति आवश्यक है। हमारे देश में वर्तमान में मात्र 19% भूमि पर वन हैं। दिल्ली एवं दिल्ली जैसे अन्य महानगरों में लोग जाने-अनजाने प्रति दिन 20 सिगरेटों के धुएँ में जितना विष होता है उतना विष प्रदूषित वायु के कारण अपने फेफड़ों में खींच लेते हैं। 

4  मनुष्य एक दिन में औसतन 21,600 बार श्वसन क्रिया करता है और इस क्रिया में 16 कि.ग्रा. ऑक्सीजन आवश्यक होता है।
एक व्यक्ति एक वर्ष में 12 टन कार्बनडाय ऑक्साईड उच्छ्वास से वातावरण में बाहर फेंकता है।

5  एक बड़ा पूर्ण विकसित वृक्ष एक मनुष्य के सम्पूर्ण आयु के लिए जितनी आवश्यक होती है उतनी मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान करता है और वहहवा, पानी, ध्वनि के प्रदूषण तथा धूल को रोकता है। वायु प्रदूषित होने के कारण खाद्य पदार्थ पोषक तत्त्वों से रहित, अशुद्ध और शक्तिहीन बन गए हैं। प्रदूषण के कारण पौधों की कार्बनडाय ऑक्साईड शोषण करने की तथा पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन छोड़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया मन्द हो रही है।

पिछले कई वर्षों से फल, सब्जी, खाद्यान आदि का परीक्षण करने पर पता चला है कि इन सबमें जहरीले कीटनाशक रसायनों के अंश विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) द्वारा निर्धारित मात्रा से कई गुना अधिक पाया जाता है। पृथ्वी पर होने वाली कुछ रासायनिक क्रियाओं से पर्यावरण में फैलनेवाले प्रदूषण के कारण आकाश स्थित ओजोन वायु की परत में एक बड़ा छिद्र हुआ है यदि इसी गति से छिद्र होते रहेंगे तो पैराबैंगनी किरणों (Ultraviolet Rays) को रोकना संभव नहीं रहेगा और इसका परिणाम यह होगा कि लोग कैन्सर, आँखों की ग्रन्थि आदि भयंकर रोगों से ग्रस्त होंगे तथा वृक्ष, वनस्पति भी प्रभावित होंगे। बढ़ते जा रहे वायु प्रदूषण पर यदि नियन्त्रण नहीं किया गया तो कुछ वर्षों बाद ऐसी स्थिति बन जाएगी कि मनुष्यों को अपने साथ प्राणवायु का सिलेण्डर बांधकर रखना होगा जिससे शुद्ध वायु ली जा सके। जैसे आज अशुद्ध जल के कारण खनिज जल (Mineral Water) की बोतल का तथा नाक को ढकने के लिए कपड़े की पट्टी (Mask) का प्रचलन हो गया है।  प्रदूषण से उत्पन्न महाविनाश के विरुद्ध यदि सामूहिक रूप से कोई उपाय नही आजमाया तो युग में मानव जीवित नहीं रह पाएगा।

अग्निहोत्र एक उपाय।

★ रूस के वैज्ञानिक श्री शिरोविच ने एक पुस्तक में लिखा है कि गाय के घी को अग्नि में डालने से उससे उत्पन्न धुआँ परमाणु विकिरण के प्रभाव को बड़ी मात्रा में दूर कर देता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह प्रक्रिया'यज्ञ' के नाम से जानी जाती है।  यज्ञ के दिव्य प्रजोयन को हमे सामूहिक स्तर पर आयोजित कर लाभांवित होना है।
सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया ।
यह  मंत्र भारतीय आध्यात्म  में सबसे उपर रखा जाता है।अग्निहोत्र यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमे दिव्य औषधी का चयन कर घी के साथ आहूत किया जाता हैं। नैनो टेक्नोलॉजी का यह जीवंत उदाहरण है। ऋषियों की धरोहर को हमे आगे लाना है, अग्निहोत्र को हम किसी भी प्रयोजन पर अलग अलग समय ,स्थान पर आयोजित कर सकते है। अग्निहोत्र के लिए विशेष महत्व देकर हम इस उपाय को कर सकते है।
वैज्ञानिक परीक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि यज्ञ-धूप से निकलने वाले अणु रेडिएशन में मौजूद अल्फा, बीटा और गामा पार्टिकल से कॉफी बड़े होते हैं। रेडिएशन पार्टिकल (अणु) आगे बढ़ने के लिए यज्ञ धूम्र के बड़े पार्टिकल से टकरा कर अपनी उर्जा खो देते हैं। इस तरह विकिरण का प्रभाव बहुत कम हो जाता है। जापान में हुए रेडिएशन के प्रभाव को यज्ञ के माध्यम से कम किया जा सकता है। (राज. पत्रिका 24/03/11 जयपुर संस्करण)

पूना में फर्ग्युसन कॉलेज के जीवाणु शास्त्रियों ने एक प्रयोग किया उन्होंने 36x22x10' घनफुट के एक हॉल में एक समय का अग्निहोत्र किया परिणाम स्वरूप 8000 घनफुट वायु में कृत्रिम रूप से निर्मित प्रदूषण का 77.5% हिस्सा खत्म हो गया इतना ही नहीं इस प्रयोग से उन्होंने पाया कि एक समय के अग्निहोत्र से ही 96% हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं यह सब यज्ञ की पुष्टीकारक गैसों से ही सम्भव हुआ है। (अग्निहोत्र)

जलती शक्कर में वायु शुद्ध करने की बहुत बड़ी शक्ति विद्यमान है। इससे चेचक, हैजा, क्षय आदि बीमारियाँ तुरन्त नष्ट हो जाती हैं। मुनक्का, किशमिश आदि फलों को (जिनमें शक्कर अधिक होती है) जलाकर देखा तो पता चला कि इनके धुएँ से आन्त्रिक ज्वर (TYPHOID) के कीटाणु 30 मिनट में और दूसरे रोगों के कीटाणु एक या दो घण्टे में नष्ट होते हैं। -(वैज्ञानिक ट्रिलवर्ट वैदिक यज्ञ विज्ञान)
 विभिन्न रोगों के जन्तुओं को समाप्त करने के लिए यज्ञ से सरल तथा सुलभ पद्धति अन्य कोई नहीं है। -एम. मॉनियर, चिकित्सा शास्त्री (एनिगएण्ड हिस्ट्री ऑफ मेडिसिन)

केसर तथा चावल को मिलाकर हवन करने से प्लेग के कीटाणु भी समाप्त हो जाते हैं।
डॉ. कर्नल किंग

अमेरिका, चिली, पॉलैण्ड, जर्मनी आदि देशों में अग्निहोत्र (हवन) की लोकप्रियता बढ़ रही है। विश्व के अनेक देशों में रोगों को दूर करने के लिए, प्रदूषण को दूर करने के लिए, तथा कृषि उत्पादन
बढ़ाने के लिए यज्ञ चिकित्सा (Home Therapy) का प्रचलन बढ़ रहा है।

 
गाय के घी के साथ हवन की सामग्री यज्ञ कुण्ड में जलाकर विशेष शक्तिशाली बनकर दूषित वायुमंडल के 99 प्रकार के दुर्गुणों को सरलता से नष्ट कर देती है। 1857 की क्रांति के जनक स्वामी दयानन्द सरस्वती ने बलि प्रथा बंद करा यज्ञों का पुनः उद्धार किया तथा यज्ञ से सम्बन्धित सभी भ्रान्तियों का वेदों के अनुसार निवारण कर इसके अनेक वैज्ञानिक व औषधीय लाभों से सम्पूर्ण विश्व को अवगत कराया। ऋषि दयानन्द कहते हैं कि जो व्यक्ति यज्ञ से शुद्ध किए हुए अन्न, जल और पवन आदि पदार्थों का सेवन करते हैं वे निरोग होकर बुद्धि, बल आरोग्य और दीर्घायु वाले होते हैं।

पौधो का योग्य चयन कीजिए।
हमारा पृथ्वी ग्रह जैव विविधता से भरा हुआ है, जिसमे वृक्षों का अनन्य साधारण महत्व है, फलों से भरा हुआ वृक्ष हो या औषधि गुणधर्म से परिपूर्ण लताएं हो, एक एक वृक्ष की अलग अलग विशेषता है, तुलसी के पौधे को पूजा स्थान से युद्ध स्थान पर लेके आना पड़ेगा। तुलसी को हम हर एक जगह, गमला हो, ऑफिस ,काम जगह पर रख सकते है।हम सभी को तुलसी जैसे पौधो को सामने लाना है ,और उपयोग करना है, यह छोटा सा प्रयास हमे वायु प्रदूषण को कुछ हद तक कम करने में मदद करेगा।

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